Yamunastotram

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यमुनास्तोत्रम्

यमुना शमनामरस्वसा व्रजतीवास्ति निजस्वसा।।

गुरुधाम दिदृक्षुणायनेत्र मयालोकि हि दक्षिणायने।।१।।

कृष्णभर्तृपरिरम्भणेन या कृष्णभा किमभवत्तथापि वा।।

कृष्णतां गतमघेन मानवं कृष्णतां नयति रातु साभवम्।।२।।

आदित्यपुत्री तुहिनाद्रिपुत्री कलिन्दपुत्रीति जगत्प्रतीता।।

स्वानुद्दधारापि यमेन नीतान् सा पातु भक्तान् यमुनाघभीतान्।।३।।

प्रालेयाद्रिर्निर्गता कृष्णकान्ता नानादेशान् या पुनानाप्यकान्ता।।

सस्नौ तोये विष्णुपद्या विशुद्धा तन्माहात्म्यं दर्शयन्ती किमद्धा।।४।।

यस्यातटे संनिकटे सदैवः श्रीकृष्ण आस्ते रतिकृत्सदैव।।

तत्कंठगश्रीतुलसीसुगन्धिसुवासितां सावतु सूर्यजाता।।५।।

पराशरात्सत्यवत्यां जातो यत्र महायशाः।।

पाराशर्यो वासुदेवपाराशर्योजसान्वितः।।६।।

मार्गे कृष्णचतुर्थ्यां तु मार्गे कृष्णप्रियां तु ताम्।।

ददर्श सार्कतनया विनयान्पातु संनया।।७।।

 

इति श्री प. प. श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीविरचितं यमुनास्तोत्रं संपूर्णम्।।


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