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१६
विश्वेश्वरादिस्तुतिः
नमः
श्रीविश्वनाथाय देववंद्यपदाय ते।
काशीशाश्वेवतारं मे देवदेव ह्युपादिश।।१।।
मायाधीशं महात्मानं सर्वकारणकारणम्।
वन्दे तं माधवं देवं यः
काशीं चाधितिष्ठति।।२।।
वन्दे
तं धर्मगोप्तारं सर्वगुह्यार्थवेदिनम्।
गणदेवं ढुंढिराजं तं
महान्तं स्वविघ्नहम्।।३।।
भारं
वोढुं स्वभक्तानां यो योगं प्राप्त उत्तमम्।
तं सढुंढिं दंडपाणिं
वंदे गांगतटस्थितम्।।४।।
भैरवं
दंष्ट्रकरालं भक्ताभयकरं भजे।
दुष्टदंडं शूलशीर्षधरं
वामाध्वचारिणम्।।५।।
श्रीकाशीं पापशमनीं दमनीं दुष्टचेतसः।
स्वर्निःश्रेणिं
चाविमुक्तपुरीं मर्त्यहितां भजे।।६।।
नमामि
चतुराराध्यां सदाsणिम्नस्थितिं
गुहाम्।
श्रीगंगे भैरवीं दूरिकुरु
कल्याणि यातनाम्।।७।।
भवानि
रक्षान्नपूर्णे सद्वर्णितगुणेsम्बिके।
देवर्षिवंद्यांबुमणिकर्णिकां मोक्षदां भजे।।८।।
इति श्री.
प. प. श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीविरचिता विश्वेश्वरादिस्तुतिः संपूर्णा।।
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नमः श्री |
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श्वनाथाय देव |
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द्यपदाय ते।। |
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काशीशा |
श्वे |
वतारं मे देव |
देù |
व ह्युपादिश।।१।। |
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मायाधी |
शं |
महात्मानं सर्व |
का |
रणकारणम्। |
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वन्दे तं |
मा |
धवं देवं यः का |
शीं |
चाधिष्ठति।।२।। |
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वन्दे तं |
ध |
र्मगोप्तारं सर्व |
गु |
ह्यार्थवेदिनम्। |
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गणदे |
वं |
ढुंढिराजं तं म |
हां |
तं स्वविघ्नहम्।।३।। |
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भारं वो |
ढुं |
स्वभक्तानां यो यो |
गं |
प्राप्त उत्तमम्। |
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तं सढुं |
ढिं |
दंडपाणिं वंदे |
गां |
गतटस्थितम्।।४।। |
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भैरवं |
दं |
ष्ट्रकरालं भक्ता |
भ |
यकरं भजे। |
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दुष्टदं |
डं |
शूलशीर्षधरं |
वा |
माध्वचारिणम्।।५।। |
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श्रीकाशीं |
पा |
पशमनीं दम |
नीं |
दुष्टचेतसः। |
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स्वर्निःश्रे |
णिं |
चाविमुक्तपुरीं |
म |
र्त्यहितां भजे।।६।। |
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नमामि |
च |
तुराराध्यां सदाs |
णि |
म्नस्थितिं गुहाम्।
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श्रीगंगे |
भै |
रवीं दूरिकुरु |
क |
ल्याणि यातनाम्।।७।। |
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भवानि |
र |
क्षान्नपूर्णे सद्व |
र्णि |
तगुणेsम्बिके। |
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देवर्षि |
वं |
द्यांबुमणिकर्णि |
कां |
मोक्षदां भजे।।८।। |
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