Saraswatinadistotram

          ५५

सरस्वतीनदीस्तोत्रम्*

(मंत्रनिर्देश)

 वाग्वादिनी पापहरासि भेदचोद्यादिकं मद्धर दिव्यमूर्ते।।

सुशर्मदे वन्द्यपदेस्तुवित्तादयाचतेहो मयि पुण्यपुण्यकीर्ते।।१।।

देव्यै नमः कालजितेस्तु मात्रेयि सर्वभा अस्यखिलार्थदे त्वम्।।

वासोत्र ते नः स्थितये शिवाया त्रीशस्य पूर्णस्य कलासि सा त्वम्।।२।।

नंदप्रदे सत्यसुतेभवा य सूक्ष्मां धियं सम्प्रति मे विधेहि।।

दयस्व सारस्वजलाधिसेविनृलोकपेरम्मयि संनिधेहि।।३।।

सत्यं सरस्वत्यसि मोक्षसद्म तारिण्यसि स्वस्य जनस्य भर्म।।

रम्यं हि ते तीरमिदं शिवाहे नांगीकरोतीह पतेत्स मोहे।।४।।

स्वभूतदेवाधिहरेस्मि वा अचेता अपि प्रज्ञ उपासनात्ते।।

तीव्रव्रतैर्जेतुमशक्यमेव तं निश्चलं चेत इदं कृतं ते।।५।।

विचित्रवाग्भिर्ज्ञगुरूनसाधू तीर्थाश्रयां तत्त्वत एव गातुम्।।

रजस्तनुर्वा क्षमतेध्यतीता सुकीर्तिरायच्छतु मे धियं सा।।६।।

चित्रांगि नाजिन्यघनाशिनीयमसौ सुमूर्तिस्तव चाम्मयीह।।

तमोघहं नीरमिदं यदाधीतीतिघ्न मे केपि न ते त्यजन्ति।।७।।

सद्योगिभावप्रतिमं सुधाम नांदीमुखं तुष्टिदमेव नाम।।

मंत्रो व्रतं तीर्थमतोधिकं हि यन्मे मतं नास्त्यत एव पाहि।।८।।

त्रयीतपोयज्ञमुखा नितांतं ज्ञं पांति नाधिघ्न इमेज्ञमार्ये।।

कस्त्वल्पसंज्ञं हि दयेत यो नो दयार्हयार्योझ्झित ईशवर्ये।।९।।

समस्तदे वर्षिनुते प्रसीद ध्येह्यस्यके विश्वगते करं ते।।

रक्षस्व सुष्टुत्युदिते प्रमत्तः सत्यं न विश्वान्तर एव मत्तः।।१०।।

स्वज्ञं हि मां धिक्कृतमत्र विप्ररत्नैर्वरं विप्रतरं विधेहि।।

तीक्ष्णद्युतेर्याधिरुगिष्टवाचोस्वस्थाय मे रात्विति ते रिरीहि।।११।।

स्तोतुं न चैव प्रभुरस्मि वेद तीर्थाधिपे जन्महरे प्रसीद।।

त्रपैव यत्सुष्टुतयेस्त्यपायात् सा जाड्यहातिप्रियदा विपद्भ्यः।।१२।।

इति श्री प. प. श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीविरचितं श्रीसरस्वतीनदीस्तोत्रं संपूर्णम्।।

                                                                                            मंत्रनिर्देश  

       55.55.