Saptapuristotram

सप्तपुरीस्तोत्रम्

स्या योध्ये रामपाद      सु  पु नीते%मृतत्वदा।।
भू   यो मास्तु ममावृत्ति      पु री षु सरयूवृते।।१।।

ध्या नान्मथुरे ते मे       द्वा सो%स्तु निरन्तरम्।।
रा    कृष्णाङ्घ्रिसंपूते         दे यमुनावृते।।२।।

पृ  थु मार्गप्रदा माये            भागीरथीवृते।।
 रा सि त्वां हरिद्वार      सु  ती र्थं प्रवदन्ति हि।।३।।

मा घं हर काशि      त्वमुच् चै स्समणिकर्णिके।।
भू या न्न मे पुनर्जन्म         पादांचिते भवे।।४।।

सा का ञ्चीनगरी        मह्य त्रा हा शिवविष्णुपूः।।
शीः प्रदाद्य मां     कृत्वा लु प्तै नसमवत्वियम्।।५।।

लो कां तनारपेक्षं       मा     ता कालेश्वरादृता।।
ना ची र्णतपसं          पातु मां मो हात्क्षिप्रयादृता।।६।।

स्या नंताश्रये मेsद्य        मो क्ष दा सिंधुतीरगे।।
त्वं  वं द्यास्यखिलैः         सर्वप्र दा द्वारवतीश्वरी।।७।।

ति राड्राजधान्याद्यं          कृष्णातटस्थिते।।
लो का मात्माख्यमाहुस्त्वां लो का नृसिंहवाटिकाम्।।८।।

कर्मभिर्नृत्यन्ति नरस्तत्सिं मायाख्यबन्धनम्।।
हन्ति यस्तद्वाटिकेयं सर्वेषां हितदा सदा।।९।।

इति श्री. प. प. श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीविरचितं सप्तपुरीस्तोत्रं संपूर्णम्।।