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प्रार्थनास्तोत्रम्
शंकर सुखकर गुरो परमदेव। देहि मयि ते दृश उरोरसकृदेव।।
किंकरवरामरतरो परमदेव। पात लवमद्य गतरोष जितदेव।।१।।
पूर्णकरुणाञ्चितकटाक्षवरदृष्ट्या। तापशमनं कुरु ममार्य
वरदृष्ट्या।।
नैव मम तिष्ठति नमः सदनुशिष्ट्या। ज्ञातमिदमर्थितमिहेदमपि
दिष्ट्या।।२।।
कर्मभिपरपारभववारिधिनिरस्तम्। काममुखघोरमकरार्तमपशस्तम्।।
जन्ममुखवीचिभिरतस्तत उदस्तम्। त्रस्तमित उद्धर गृहाण मम
हस्तम्।।३।।
त्रस्तशरणार्थिकरुणोक्तमपि किं ते। न श्रुतमपीदृश उपेक्ष्य इह
किं ते।।
उद्धरणमस्य करुणाकर कियत्ते। अथापि न मनो द्रवति कोमलमहो ते।।४।।
प्रसीद मे सागस
आर्तबन्धो। कारुण्यसिन्धोsनुपमास्तबन्धो।।
बन्धो मृषापि व्यथयत्ययं माम्। स्वप्नोपमं छिन्ध्यव सर्वतो
माम्।।५।।
इति श्री प. प.
श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीविरचितं प्रार्थनास्तोत्रं संपूर्णम्।।