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१५
मृत्युंजयगर्भितस्तोत्रम्
वाण्या ॐकाररूपिण्या
अन्त उक्तोsस्य
नान्यथा।
सुरस्त्रिभुवनेशः स
नस्सर्वान्तःस्थितोsवतु।।१।।
देवो यं सर्वदेवाद्यः
सूरिरुन्मत्तवत्स्थितः।
वाहो बलीवर्दकोsस्य
याचकस्येष्टदः स तु।।२।।
नंदिस्कंधाधिरूढोsपि
त्रिप्रमित्यतिगः स्वभूः।
दशा यस्य न
शंभुं तं संतं वन्देsखिलात्मकम्।।३।।
सद्योजातोsष्टमूर्तिः
स भूतबंदिस्तुतोsजितः।
रक्ष
मन्मथहन्नाथ तोकधर्माणमद्य माम्।।४।।
स्वतोsहेतोजगद्धेतो
दयानाथांबिकापते।
तीव्रा
सुहृत्त्रिविधहृत्तापान्मृत्योश्च मामव।।५।।
कृतागसमपि
त्राह्यत्रेर्मृत्योस्त्वं भिषक्तमः।
तत्संधिं भिन्धि
सर्वाकयोनेर्मुञ्चस्व मां शिवः।।६।।
श्रीद पुष्टिद ते
व्याप्तं दिक्षु क्षीरनिभं यशः।
रुङ्मार्ष्टिकृद्रक्ष मां त्वं गंगा यन्मूर्ध्नि चर्क्षराट्।।७।।
द्रष्ट वससि सर्वत्र बत
मां ईक्षसे न किम्।
स्तुतेर्धर्मेश
शक्तिर्निरस्तमृत्यो न मेsज
ते।।८।।
तिष्टानंदद चित्ते मे समंतात्परिपालय।।९।।
इति श्री प. प. श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीविरचितं
मृत्युंजयमंत्रगर्भितस्तोत्रं संपूर्णम्।।
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वाण्या |
ॐ
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काररूपिण्या अन्त
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उ |
क्तो%स्य
नान्यथा।
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सुरस् |
त्रि |
भुवनेशः स नस्स |
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न्तः स्थितोsवतु।।१।। |
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सर्व देवाद्यः सूरि |
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न्मत्तवत्स्थितः। |
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स्येष्टदः स तु।।२।। |
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धाधिरूढोsपि
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त्यतिगः स्वभूः। |
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दशा |
य |
स्य न शंभुं तं संतं |
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न्देsखिलात्मकम्।।३।। |
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सद्यो |
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तोsष्टमूर्तिः
स भूत |
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दिस्तुतो%जितः। |
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रक्ष |
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न्मथहन्नाथ तोक |
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र्माणमद्य माम्।।४।। |
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तोजगद्धेतो दया |
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थांबिकापते। |
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हृत्त्रिविधहृत्तापा |
न्मृ |
त्योश्च मामव।।५।। |
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कृता |
ग
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समपित्राह्यत्रेर्मृ
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त्यो |
स्त्वं भिषक्तमः। |
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तत्सि |
न्धिं
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भिन्धि सर्वाकयोने |
र्मु |
ञ्चस्व मां शिवः।।६।। |
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श्रीद |
पु |
ष्टिद ते व्याप्तं दिक्षु
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क्षी |
रनिभं यशः। |
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रुङ्मार् |
ष्टि
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कृद्रक्ष मां त्वं गंगा |
य |
न्मूर्ध्नि चर्क्षराट्।।७।। |
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द्रष्ट |
व |
ससि सर्वत्र बत |
मां |
ईक्षसे न किम्। |
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स्तुते |
र्ध |
र्मेश शक्तिर्निरस्त |
मृ |
त्यो न मेsज
ते।।८।। |
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तिष्ठा |
नं |
दद चित्ते मे समं |
तात् |
परिपालय।।९।। |
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