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श्रीगुरुचरितम्
(द्विसाहस्री संहिता)
यह श्रीवासुदेवानंद स्वामी
महाराजजी का प्रथम ग्रंथ है। माणगांव में गृहस्थाश्रम कीअवस्था में
(ईसवी 1884) श्रीदत्तप्रभूकी आज्ञा से इसकी रचना हुई।
श्रीदत्तसंप्रदाय का श्रेष्ठतम प्रमाण ग्रंथ "श्रीगुरुचरित्र"
का यह संस्कृत अनुवाद है। इस में श्रीदत्तात्रेय भगवान के कलियुग में
प्रसिद्ध प्रथम दो अवतार - श्रीपादश्रीवल्लभ एवं
श्रीनृसिंहसरस्वती के चरित्रों का वर्णन है। साथ ही
श्रीनृसिंहसरस्वती द्वारा प्रसंगोचित पुराणकथाओं द्वारा किया गया
वैदिक धर्म के मूलतत्त्व, उपासना तथा आचारों का प्रतिपादन भी है।
मराठी से अपरिचित दत्तभक्तों की सुविधा के लिये इस संस्कृत ग्रंथ का
निर्माण श्री स्वामी महाराज द्वारा किया गया है। मूल 7000 ओवी के
मराठी ग्रंथ का संपूर्ण आशय लगभग 2000 संस्कृत श्लोकों में निबद्ध कर
के श्री स्वामी महाराजजी ने अपने भाषाप्रभुत्व का परिचय दिया है।
केवल 12 दिन में इस ग्रंथ का लेखन पूरा होने पर श्रीस्वामी महाराजजी
के कानों पर शब्द आये 'संहितेयं
द्विसाहस्री'। इस प्रकार श्री
दत्तभगवान ने स्वयं इस का नामाभिधान कर के इस को संहिता होने की
मान्यता दी है। इस का भाव जानने के लिए श्री स्वामी महाराजजी ने जब
ग्रंथ के श्लोकों की गणना की तो वह 1800 से कुछ अधिक हुई। इस पर कुछ
विचार करने पर श्री स्वामी महाराजजी ने फिर से हवनादि के लिए
दुर्गासप्तशती आदि के मंत्रों की गणना जिस प्रकार की जाती है उस
प्रकार से उवाच मंत्र, अर्धश्लोक आदि को मिला कर गणना करने पर 2000
की संख्या प्राप्त हुई। इस ग्रंथ की टीका जिसे एक प्रगल्भ भाष्य कहा
जा सकता है, कुछ 10 वर्ष के पश्चात् श्रीस्वामी महाराज द्वारा
संन्यासाश्रम में, मू ग्रंथ सामने न होने पर भी, प्रभास और द्वारका
क्षेत्रों में संपन्न हुई। ईसवी 1907 में संध्यामठ (तंजावर) के
चातुर्मास के दौरान इस ग्रंथ की चूर्णिका - सरल संस्कृत गद्य में
अनुवाद भी संपन्न हुई।
Âसप्ताहपाठपद्धति
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प्रथमेsह्नि
चतुर्थाध्यायान्त, द्वितीये नवमाध्यायान्त, तृतीये चतुर्दशाध्यायान्त,
पञ्चमाध्यायान्त, षष्ठे एकविंशाध्यायान्त, सप्तमे त्रयोविंशोsध्यान्त
पठित्वा रहस्यद्वयं पठेत्। प्रत्यहंमादौ ग्रंथपूजनोत्तरं
श्रीवैष्णवेत्यादि स्तुतयः पठेत्। अन्ते चोत्तरपूजनं कृत्वा
'रसज्ञा वशे'त्यपराधक्ष्मापनस्तोत्रं
पठेत्।
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इस ग्रंथ का आरंभ 112 श्लोकों की
श्रीगुरुस्तुति से होता है। इस में मंगलाचरण, मानसपूजा,
अपराधक्ष्मापन, अष्टोत्तरशतनाम, श्रीदत्तगुरु का स्वरूप, अवतार,
दिनचर्या, ध्यान आदि का समावेश है।
अध्याय
1
:- जीवब्रह्मैक्य, तत्त्वंपदार्थ,
नामधारक का गाणगापूर जा कर अनशन करना और उसे स्वप्न में दत्तभगवान के
दर्शन।
अध्याय 2 :- नामधारक
की सिद्ध सरस्वती से भेंट और संवाद, गुरु शब्द का अर्थ, जगत का सर्जन,
कृतादि युगों का वर्णन, देवताओं से भी गुरु की श्रेष्ठता तथा
दीपकाख्यान।
अध्याय 3 :-
उपोद्घात, अनसूया के पातिव्रत्य का माहात्म्य,
ब्रह्मा, विष्णु और महेश का अत्रि महर्षि के आश्रम में आगमन और सती
अनसूया से मनीषा का कथन, तीनों का बालक होना और सती के दुग्धपान से
तृप्त होना, अत्रि का घर आ कर तीनों ईश्वरों की स्तुति करना तथा उन का
नामकरण एवं अंबरीषाख्यान।
अध्याय 4
:- श्रीदत्त-यदुसंवाद और दत्त के
द्वारा 24 गुरु का निरूपण, प्रल्हाद को स्वरूपानंद की
प्राप्ती का उपाय का तथा कार्तवीर्यार्जुन को अष्टांगयोग का उपदेश।
अध्याय 5 :-
आपळराजा ब्राह्मण की पत्नी की श्राद्धान्नभिक्षा से
तुष्ट हो कर श्रीदत्त का उस का पुत्र होना, व्रतबंध के पश्चात्
विवाह के लिये निषेध, माता को स्वरूपदर्शन और उपदेश, अंध और
पंगु भ्राताओं को सुदृढ बना कर गृहत्याग कर के तीर्थयात्रा पर निकल
पडना।
अध्याय 6 :-
गोकर्णवर्णन, गणेशजी का रावण से लिंग हरण कर के उस की स्थापना,
मित्रसह राजा तथा चांडाली की कथाएँ।
अध्याय 7 :-
मूढ पुत्र के साथ आत्महत्या को उद्युक्त विधवा ब्राह्मणी को शनिप्रदोष
की कथा सुना कर उसे आगामी जन्म में स्वतुल्य वंद्य पुत्र की
प्राप्ति का वरदान, मंदमति पुत्र को सुविद्य बनाना तथा
अदृश्य होने के पश्चात् भी चोरों द्वारा मारे गये वणिग्वृत्ति ब्राह्मण
भक्त का संजीवन।
अध्याय 8 :- कारंजा में माधव और अंबा कि
पुत्र के रूप में जन्म लेना, जन्मतः ओंकारोच्चारण, मूकत्वधारण,
लोह का सुवर्ण करना, व्रतबंध के अवसर पर बिना पढे वेदों का पठण
इत्यादि लीला करने के पश्चात् माता-पिता से संन्यास के लिए आज्ञा
मांगना, माता को उपदेश, माता के युग्म पुत्र होने के बाद काशी जा कर
श्रीकृष्णसरस्वती से संन्यासग्रहण, गंगासागरगमन एवं गुरुपरंपरा।
अध्याय 9 :-
श्रीगुरु के प्रमुख शिष्य, जन्मस्थान जा कर माता-पिता का दर्शन,
गोदावरी के किनारे जाते हुए शूलरोगपीडित ब्राह्मण की व्याधि का
परिहार, सायंदेव के घर भिक्षा कर के उसे यवनभय से मुक्ति,
उपासनानिरूपण, ज्ञान की सात भूमिका, आश्रमधर्म तथा तीर्थयात्रोपदेश।
अध्याय 10 :-
परली वैद्यनाथ में एकांतवास, गुरुत्यागी ब्राह्मण को धोम्यमुनि
के तीन शिष्यों की कथाद्वारा शिष्यधर्म का उपदेश और उस का उद्धार।
अध्याय 11 :-
विद्वान् ब्राह्मण के मूढ पुत्र का जगदंबा भुवनेश्वरी के मंदिर में
जिह्वात्याग, देवी की आज्ञा से उस नदी के पार ठहरे श्रीगुरु के समीप जा
कर उन की कृपा से जिह्वा एवं विद्वत्ता का लाभ, श्रीगुरु का
श्रीकृष्णा-पंचगंगा संगम पर आगमन, शाकभिक्षा से प्रसन्न
हो कर निष्कांचन ब्राह्मण को संपत्ति का दान, उदुंबुर वृक्ष की
महिमा, नदीप्रवाह के भीतर जा कर चतुःषष्टी योगिनी से पूजा तथा
भिक्षा ग्रहण करना, गंगानुज को योगगति से त्रिस्थली यात्रा कराना, 12
वर्ष बाद योगिनियों को वरदान दे कर गाणगापूर को गमन।
अध्याय 12
:- पिशाचद्वारा अपत्यनाश से पीडित शिरोल
के ब्राह्मणी उस से मुक्ति दिला कर उसे पुत्रप्राप्ति, ज्येष्ठ पुत्र
के चौलकर्म के पूर्व मृत्यु से दुःखित ब्राह्मणी को
तत्त्वज्ञान का उपदेश और सांत्वना, ब्राह्मणी का पुत्र का शव ले
कर संगम पर आना और पादुका पर सिर पटक कर निद्रित होना, भगवान
दत्त का उसे स्वप्न में दर्शन दे कर मृत पुत्र को जीवित करना।
अध्याय 13 :- वंध्यामहिषीदोहन, राजा
की प्रार्थना से नगर में आगमन, ब्रह्मराक्षस का उद्धार,
त्रिविक्रमभारती को विश्वरूपदर्शन तथा उसे उपदेश।
अध्याय
14 :- वेदाध्ययन से गर्वित विप्रों
को ले कर त्रिविक्रमभारती का श्रीगुरु के पास आगमन, उन्हें वेदों के
आदि-अंत बता कर अंत्यज के हाथों उन का गर्वपरिहार।
अध्याय 15 :-
कर्मविपाकनिरूपण, अंत्यज को दी हुई विद्या का परिहरण तथा
भस्ममाहात्म्य।
अध्याय 16 :-
गोपीनाथ के श्रीदत्त के प्रसाद से प्राप्त यक्ष्माग्रस्त पुत्र
को ले कर उस की भार्या का गाणगापूर को आना, पति के मृत्यू पर सती का
शोक, साधुवेष में श्रीगुरु का उसे उपदेश, बृहस्पति और लोपामुद्रा के
संवाद के माध्यम से स्त्रियों के आचार एवं विधवाधर्म का निरूपण,
सहगमन के लिए सिद्ध सती का श्रीगुरु के दर्शन को जाना और श्रीगुरु
द्वारा उस के पति का संजीवन।
अध्याय 17 :-
श्रीगुरुद्वारा सती को मर्कट-कुक्कुटाख्यान द्वारा
रुद्राक्षधारण की महिमा तथा अतिरुद्राभिषेक से राजपुत्र की आयु बढने
के आख्यानद्वारा रुद्राध्यामाहात्म्य का निरूपण, शुक्राचार्य की कथा
एवं स्त्रियों को मंत्रोपदेश का निषेध, सोमवार व्रत और सीमंतिनी
आख्यान।
अध्याय 18 :-
परान्नत्यागी ब्राह्मण को पत्नी के आग्रह पर भोजन के आमंत्रण का
स्वीकार करने की आज्ञा, का श्वान-सूकरों द्वारा उच्छिष्ट
होते अन्न को देख कर ब्राह्मणपत्नी का पति के साथ भोजन त्याग कर
श्रीगुरु के पास आना, श्रीगुरुद्वारा परान्नग्रहणाग्रहण के विषय में
उपदेश करना तथा पाराशरोक्त कर्ममार्ग और ब्राह्मण के आचार
कानिरूपण।
अध्याय 19 :-
मात्र तीन व्यक्ति के लिए पकाये अन्न से चार हजार लोगों को भोजन,
वृद्ध वंध्या को अश्वत्थसेवा द्वारा कन्या-पुत्र की प्राप्ति कराना,
शबरकथा के माध्यम से श्रद्धा का माहात्म्य बताना, नरहरि ब्राह्मण के
कुष्ठ का परिहार, नरहरिद्वारा श्रीगुरु की स्तुति।
अध्याय 20 :-
श्रीगुरु के दर्शन के लिये आये सायंदेव की परीक्षा, उसे
त्वष्टापुत्र की कथाद्वारा काशीयात्रा एवं गुरुभक्ति का निरूपण,
सायंदेवकृत श्रीनृसिंहसरस्वतीस्तोत्र और अनंतव्रत का निरूपण।
अध्याय 21 :-
तंतुक भक्त को योगगति से श्रीशैल्य का दर्शन, विमर्षण राजा के
आख्यान द्वारा श्रीशैल्य का माहात्म्य का वर्णन, नंदीनाम ब्राह्मण के
कुष्ठ का परिहार, नंदीकृत श्रीगुरु का स्तोत्र, नरकेसरी कवि में
श्रीगुरु का स्वप्न में दर्शन दे कर उसे शिष्य के रूप में स्वीकर
करना।
अध्याय 22 :-
दीपावली के त्यौहार में सात गांवों के भक्तों के आग्रह पर
सात रूप धारण कर उन सब साथ दीपावली मनाना तथा गाणगापूर में भी रहना,
शूद्र भक्त के धान को समय के पहले कटवा कर भी शतगुणित धान्य पैदा
करना, गाणगापूर के आठ क्षेत्रों का निरूपण, पूर्वाश्रम की
भगिनी रत्नाबाई के कुष्ठ का परिहार।
अध्याय 23 :-
श्रीपादश्रीवल्लभ का रजक भक्त को सार्वभौम राजा बनने का वरदान,
उस का यवन राजा के रूप में पुनर्जन्म, स्फोटकपीडित राजा को वज्रबाहू
के पुत्र की कथा का निरूपण, राजा का श्रीगुरु के दर्शन के लिये
गाणगापूर आना, राजा के स्फोटक की शांति, राजा की इच्छा से श्रीगुरु
का उस के नगर को जा कर उस की पूजा ग्रहण करना, राजा से प्राप्त राज्य
का उसी के पुत्र को दान, राजा को श्रेष्ठ गति का वरदान, श्रीगुरु का
श्रीशैल जा कर अंतर्धान होना।
योगरहस्य :-
इस में अष्टांगयोग का विवरण है।
बोधरहस्य :-
इस में वेदान्त का निरूपण है।
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