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श्रीगोदावरीस्तोत्रम्
वासुदेवमहेशात्मकृष्णावेणीधुनीस्वसा।
स्वसाराद्या जनोद्धर्त्री पुत्री सह्यस्य गौतमी।।१।।
सुरर्षिवंद्या भुवनेऽनवद्या
याद्यात्र नद्याश्रितपापहंत्री।
देवेन या कृत्रिमगोवधोत्थदोषापनुत्यै मुनये प्रदत्ता।।२।।
वार्युत्तमं ये
प्रपियन्ति मर्त्या यस्याः सकृत्तेऽपि
भवन्त्यमर्त्याः।।
नंदंत ऊर्ध्वं च यदाप्लवेन नरा दृढेनैव सवप्लवेन।।३।।
दर्शनमात्रेण मुदा गतिदा गोदावरी वरीवर्ती।।
समवर्तिविहायद्रोधासी मुक्तिः सती नरीनर्ति।।४।।
रम्ये वसतामसतामपि यत्तीरे हि सा गतिर्भवति।।
स्वच्छान्तरोर्ध्वरेतोयोगिमुनीनां हि सा गतिर्भवति।।५।।
तीव्रतापप्रशमनी सा पुनातु महाधुनी।।
मुनीढ्या धर्मजननी पावनी नोद्यताशिनी।।६।।
सदा
गोदार्तिहा गंगा जंतुतापापहारिणी।।
मोदास्पदा महाभंगा पातु पापापहारिणी।।७।।
गोदा
मोदास्पदा मे भवतु वरवता देवदेवर्षिवन्द्या।।
पारावाराग्र्यरामा जयति यतियमीट्सेविता विश्ववित्ता।।८।।
पापाद्या पात्यपापा धृतिमतिगतिदा कोपतापाभ्यपघ्नी।।
वंदे
तां देवदेहां मलकुलदलनीं पावनीं वंद्यवंद्याम्।।९।।
इति
श्री प. प. श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीविरचितं गोदाष्टकं संपूर्णम्।।
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