५३
गंगास्तोत्रम्*
(मंत्रनिर्देश)
गंगे
दर्शय ते रूपं मुक्तिदं मुनिचिंतितम्।।
गायत्तारिणि ते दृष्ट्या च्यवेत्को निजरूपतः।।१।।
गंगे त्रेधाऽघहंत्रीति
ते कीर्तिर्दिक्षु विस्तृता।।
गेया योगिमुनिध्येया सदा त्वं गंग आधिहे।।२।।
तिष्येंऽहस्तरणं
मातर्वरिष्ठे बत नान्यतः।।
यो वैरिः कामसंज्ञो मे पाह्यतो रोषहेतुतः।।३।।
ब्रूते कृत्स्न श्रुतं त्रात्री पेयोदाबात्मिकेति यत्।।
या तृष्णया मतिर्भ्रष्टाऽऽभ्योद्भ्यो
बालः पुनातु ताम्।।४।।
द्योत उत्कृष्ट एवास्तु विष्णुजेऽपिहितान्तरे।।
जगन्मतिक्षालके भूष्णुस्सन्स्त्वां शान्तिदेर्यथे।।५।।
नास्मत्तारक एवान्यो लोके वाचो मृषा न मे।।
नांतोऽनन्तेऽत्र
मेऽघस्य
कं ब्रूयां ज्ञानदेऽत्र
तु।।६।।
शत्रून्दमय मे देवि सकलानमृतप्रदे।।
तैर्हि दान्तो विमुक्तः स्यां गतैनाः साध्व्यसंशयः।।७।।
रक्ष यद्यपि पापोऽहं
च्छन्दोऽर्च्ये
गवि जाह्नवि।।
पिता कः काऽपराम्बा
मे तिष्ये तारः परश्च कः।।८।।
इति
श्री प. प. श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीविरचितं गंगास्तोत्रं
संपूर्णम्।।
मंत्रनिर्देश
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गं |
गे |
द |
र्शय ते रूपं |
मु |
क्तिदं |
मु |
निचिंतितम्।। |
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गा |
य |
त्ता |
रिणि ते दृष्ट्या |
च्य |
वेत्को |
नि |
जरूपतः।।१।। |
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गं |
गे |
त्रे |
धाऽघहंत्रीति |
ते |
कीर्ति |
र्दि |
क्षु विस्तृता।। |
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गे |
या |
यो |
गिमुनिध्येया |
स |
दा त्वं |
गं |
ग आधिहे।।२।। |
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ति |
ष्येंऽ |
ह |
स्तरणं मात |
र्व |
रिष्ठे |
ब |
त नान्यतः।। |
|
यो |
वै |
रिः |
कामसंज्ञो मे |
पा |
ह्यतो |
रो |
ष हेतुतः।।३।। |
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ब्रू |
ते |
कृ |
त्स्नश्रुतं त्रात्री |
पे |
योदा |
बा |
त्मिकेति यत्।। |
|
या |
तृ |
ष्ण |
या मतिर्भ्रष्टाऽऽ |
भ्यो |
द्भ्यो बा |
लः |
पुनातु ताम्।।४।। |
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द्यो |
त |
उ |
त्कृष्ट एवास्तु |
वि |
ष्णुजेऽ |
पि |
हितान्तरे।। |
|
ज |
ग |
न्म |
ति क्षालके भू |
ष्णु |
सन्स्त्वां |
शा |
न्तिदेर्थये।।५।। |
|
ना |
स्म |
त्ता |
रक एवान्यो |
लो |
के वा |
चो |
मृषा न मे।। |
|
नां |
तोऽ |
न |
न्तेऽत्र
मेऽघस्य |
कं |
ब्रूयां |
ज्ञा |
नदेऽत्र
तु।।६।। |
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श |
त्रू |
न्द |
मय मे देवि |
स |
कला |
न |
मृतप्रदे।। |
|
तै |
र्हि |
दा |
न्तो विमुक्तः स्यां |
ग |
तैनाः |
सा |
ध्व्यसंशयः।।७।। |
|
र |
क्ष |
य |
द्यपि पापोऽहं |
च्छ |
न्दोऽर्च्ये |
ग |
वि जाह्नवि।। |
|
पि |
ता |
कः |
काऽपराम्बा
मे |
ति |
ष्ये ता |
रः |
परश्च कः।।८।। |
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